हर मनुष्य के जीवन में हार-जीत होता रहता है। मनुष्य हार के बाद एक नई सीख के साथ जीत की तैयार में लग जाता है। लेकिन कुछ लोग इसे भी होते है जो बड़ी जीत के लिए हारना या हराना पड़ता है। शायद इसको हमलोग राजनीती या कूटनीति कह सकते है। और राजनीती में करना पड़ता है। राजनीती करने वाले लोग, सत्ता प्राप्त करने के लिए सालों लगा देता है। कितने लोग सारा जीवन राजनीती में बिता देता है। जहाँ तक में सोचता हूँ की राजनीती में दो तरह के लोग होते है। एक वह जो अपने फायदे के लिए संगठन से जुरा रहता है। दूसरा वह जो कुछ कर दिखाने का होसला रखता है और अपने समाज के लोगों को मदद करने में लगा रहता है। समाज को अपने परिवार की तरह से देखता है। अपने समाज को व्यवस्थित रूप से रखने के लिए पूरी तरह से तेयार रहता है। सफलता ही उसको मजबूत बनाता है। जो आगे चलकर समाज का बड़ा चेहरा बनकर सामने आता है। मै बात कर रहा हूँ भारत की एक गाँव- वहां रहने वाले लोगों के सामाजिक और राजनीती सोंच की।
जिसके फैसले से ही राज्य से लेकर केंद्र तक की सरकार बनती है। मेरे गाँव में २० अप्रैल २०११ को पंचायत चुनाव हुआ था। मेरी माँ श्रीमती यशोदा देवी १३ उम्मीदवार के साथ फिर से मुखिया पद के चुनाव लड़ी थी। जिसमे मेरी माँ की हार हुआ, हारना हमारे परिवार का एक निति था। क्योंकि २०११ के बिहार विधानसभा के चुनाव में, मै स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप चुनाव लड़ा था। यह मेरे जीवन की सबसे बड़ा पहल था। इस होसले को देखकर परिवार के साथ-साथ पुरे विधानसभा लोग आश्चर्य चकित हो गए। क्योंकि मै सबसे कम उम्र था जिसको आदमी कभी सोंच नहीं सकता था। इसमे भी मेरा हार हुआ। जनता का वोट अच्छा मिला था। उम्मीद से अधिक लेकिन मेरे गाँव से कम वोट आया था। जिस कारण मेरे परिवार वाले नाराज थे, और बाकि वोट बाहर के गाँव से मिला था। श्री नितीश जी लहर में, समाज में कम समय देकर इतना वोट लाना आश्चर्जनक है। यह समाज के लोगों का कहना था।
जिसके फैसले से ही राज्य से लेकर केंद्र तक की सरकार बनती है। मेरे गाँव में २० अप्रैल २०११ को पंचायत चुनाव हुआ था। मेरी माँ श्रीमती यशोदा देवी १३ उम्मीदवार के साथ फिर से मुखिया पद के चुनाव लड़ी थी। जिसमे मेरी माँ की हार हुआ, हारना हमारे परिवार का एक निति था। क्योंकि २०११ के बिहार विधानसभा के चुनाव में, मै स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप चुनाव लड़ा था। यह मेरे जीवन की सबसे बड़ा पहल था। इस होसले को देखकर परिवार के साथ-साथ पुरे विधानसभा लोग आश्चर्य चकित हो गए। क्योंकि मै सबसे कम उम्र था जिसको आदमी कभी सोंच नहीं सकता था। इसमे भी मेरा हार हुआ। जनता का वोट अच्छा मिला था। उम्मीद से अधिक लेकिन मेरे गाँव से कम वोट आया था। जिस कारण मेरे परिवार वाले नाराज थे, और बाकि वोट बाहर के गाँव से मिला था। श्री नितीश जी लहर में, समाज में कम समय देकर इतना वोट लाना आश्चर्जनक है। यह समाज के लोगों का कहना था।पंचायत चुनाव पांच साल में एक बार होता है- पंचायत
के अंदर राजनीती गर्म है। ग्राम पंचायत राज मस्सा में मुखिया पद के लिए १३ उम्मीदवार, सरपंच पद के लिए ७ और जिला परिषद् के लिए ३ उम्मीदवार है। यहाँ पर राजनीती चहल-कदमी बहुत जोरों से चल रहा है। सभी उम्मीदवार जनता को अपने ओर आकर्षित करने के कोशिश में लगे हुआ है। चौक-चोराहे पर सिर्फ पंचायत के चुनाव या उम्मीदवार का चर्चा चल रहा है। अगर अभी के स्थिति अपने आँखों से देखा जाय तो यह एक बड़ा त्यौहार है। जिसमे समाज के सभी छोटा-बड़ा पूरी उत्सुकता के साथ व्यस्त है क्योंकि जनता के दिमाग में सोना- जागना सिर्फ पंचायत चुनाव का ही चर्चा हो रहा है। जनता भी अपने-अपने उम्मीदवार के लिए वोट मांगने और दिलाने में पूरी कोशिश में लगा हुआ है।
के अंदर राजनीती गर्म है। ग्राम पंचायत राज मस्सा में मुखिया पद के लिए १३ उम्मीदवार, सरपंच पद के लिए ७ और जिला परिषद् के लिए ३ उम्मीदवार है। यहाँ पर राजनीती चहल-कदमी बहुत जोरों से चल रहा है। सभी उम्मीदवार जनता को अपने ओर आकर्षित करने के कोशिश में लगे हुआ है। चौक-चोराहे पर सिर्फ पंचायत के चुनाव या उम्मीदवार का चर्चा चल रहा है। अगर अभी के स्थिति अपने आँखों से देखा जाय तो यह एक बड़ा त्यौहार है। जिसमे समाज के सभी छोटा-बड़ा पूरी उत्सुकता के साथ व्यस्त है क्योंकि जनता के दिमाग में सोना- जागना सिर्फ पंचायत चुनाव का ही चर्चा हो रहा है। जनता भी अपने-अपने उम्मीदवार के लिए वोट मांगने और दिलाने में पूरी कोशिश में लगा हुआ है।श्रीमती यशोदा देवी को हारना तय था- श्रीमती यशोदा देवी की हार के कारण विकास, परिवर्तन और लालच।
क्योंकि पांच सालो में काफी विकास हुआ ये सिर्फ एक गाँव की बात नहीं, सभी गाँवों की बात है। ( मुझे पता है जब मेरे पिता जी श्री जयनंदन कुमार मुखिया थे उस समय बिहार सरकार के इतने पास पैसे नहीं थे। या पंचायत तक पहुँच नहीं पता था। उस समय समाज के देखभाल लिए पिता जी अपना जमीन बेच कर पैसा देते थे।) जिस कारण कई उम्मीदवार खड़ा हो गया। और जीत के लिए कुछ भी करने के लिए तेयार था। पहली बार ग्राम चुनाव में एक पंचायत के अन्दर लगभग १५,०००,०० लाख रुपया खर्च हुआ है। जिसको मैंने समाज के लोगों से महसुश किया है। २००६ में, श्रीमती यशोदा देवी की जीत के बाद, उनके बड़े पुत्र श्री संजय कुमार माँ की सत्ता को सँभालने के लिए एक कार्यकर्त्ता के रूप में आगे आया। इससे पहले लो का प्रक्टिस दरभंगा सिविल कोर्ट में करते थे। पिता जी का अधिक अवस्था हो जाने के वजह से गाँव की राजनीती अपने पड़े पुत्र श्री संजय कुमार को संचालन करने के लिए दे दिया। श्री संजय कुमार युवा होने के कारण उन्होंने अपने कार्य के लिए युवा को आगे बढाया। जिस वजह से समाज के कुछ लोग नाराज रहते थे और उनलोगों को आन्तरिक इक्छा था की मुखिया जी यानि श्री जयनंदन कुमार ही सत्ता संचालन करे।
क्योंकि पांच सालो में काफी विकास हुआ ये सिर्फ एक गाँव की बात नहीं, सभी गाँवों की बात है। ( मुझे पता है जब मेरे पिता जी श्री जयनंदन कुमार मुखिया थे उस समय बिहार सरकार के इतने पास पैसे नहीं थे। या पंचायत तक पहुँच नहीं पता था। उस समय समाज के देखभाल लिए पिता जी अपना जमीन बेच कर पैसा देते थे।) जिस कारण कई उम्मीदवार खड़ा हो गया। और जीत के लिए कुछ भी करने के लिए तेयार था। पहली बार ग्राम चुनाव में एक पंचायत के अन्दर लगभग १५,०००,०० लाख रुपया खर्च हुआ है। जिसको मैंने समाज के लोगों से महसुश किया है। २००६ में, श्रीमती यशोदा देवी की जीत के बाद, उनके बड़े पुत्र श्री संजय कुमार माँ की सत्ता को सँभालने के लिए एक कार्यकर्त्ता के रूप में आगे आया। इससे पहले लो का प्रक्टिस दरभंगा सिविल कोर्ट में करते थे। पिता जी का अधिक अवस्था हो जाने के वजह से गाँव की राजनीती अपने पड़े पुत्र श्री संजय कुमार को संचालन करने के लिए दे दिया। श्री संजय कुमार युवा होने के कारण उन्होंने अपने कार्य के लिए युवा को आगे बढाया। जिस वजह से समाज के कुछ लोग नाराज रहते थे और उनलोगों को आन्तरिक इक्छा था की मुखिया जी यानि श्री जयनंदन कुमार ही सत्ता संचालन करे। राजनीती, जिससे बड़े-बड़े को पसीना छुट गया- संजय कुमार ने अपने सारे कार्यकर्त्ता को उम्मीदवार के रूप में खड़ा कर दिया।
लगभग पचीस उम्मीदवार को अपने हाथों नोमिनेशन करवाया। वे पहले से जानते थे की इसमे कोई एक ही जीत पायेगा। लेकिन सभी को संघर्ष, जीत और हार का अनुभव प्राप्त हो जायेगा। राजनीती का महत्वपूर्ण मंत्र भी मालूम हो जायेगा। जिससे आने वाले कल में, चुनाव अपनी सूझ-बुझ के साथ लड़े। उनको यह भी मालूम था की उम्मीदवार हो जाने के बाद हमरे लिए वोते नहीं मांग पायेगा। क्योंकि इन लोगों जीत का लालच मजबूर कर देगा। चुनाव आयुक्त सख्त हिदायत के वजह से चुनावी प्रचार सिर्फ तीन-चार रोज ही करना था। लेकिन आंतरिक राजनीती काफी दिनों से चल रहा था। जिसको अनुभव करने वाला कर रहा था। आरक्षण होने के वजह से सभी महिला उम्मीदवार थी। जो की नाम के लिए थी। किसको राजनीती का 'आ' शब्द भी नहीं मालूम थी। इसमे सिर्फ श्रीमती यशोदा देवी को घर में पुस्तैनी राजनीती होने के वजह से मालूम था। सभी की नेत्रित्व करने वाला पति या पुत्र था और समाज इन लोगों का अपना पहचान था। वोट इन लोगों को ही मिलेगा उम्मीदवार को नहीं। और समाज में भी इनलोगों का पहचान था।
लगभग पचीस उम्मीदवार को अपने हाथों नोमिनेशन करवाया। वे पहले से जानते थे की इसमे कोई एक ही जीत पायेगा। लेकिन सभी को संघर्ष, जीत और हार का अनुभव प्राप्त हो जायेगा। राजनीती का महत्वपूर्ण मंत्र भी मालूम हो जायेगा। जिससे आने वाले कल में, चुनाव अपनी सूझ-बुझ के साथ लड़े। उनको यह भी मालूम था की उम्मीदवार हो जाने के बाद हमरे लिए वोते नहीं मांग पायेगा। क्योंकि इन लोगों जीत का लालच मजबूर कर देगा। चुनाव आयुक्त सख्त हिदायत के वजह से चुनावी प्रचार सिर्फ तीन-चार रोज ही करना था। लेकिन आंतरिक राजनीती काफी दिनों से चल रहा था। जिसको अनुभव करने वाला कर रहा था। आरक्षण होने के वजह से सभी महिला उम्मीदवार थी। जो की नाम के लिए थी। किसको राजनीती का 'आ' शब्द भी नहीं मालूम थी। इसमे सिर्फ श्रीमती यशोदा देवी को घर में पुस्तैनी राजनीती होने के वजह से मालूम था। सभी की नेत्रित्व करने वाला पति या पुत्र था और समाज इन लोगों का अपना पहचान था। वोट इन लोगों को ही मिलेगा उम्मीदवार को नहीं। और समाज में भी इनलोगों का पहचान था। मस्सा ग्राम पंचायत- ६ गाँव या टोला मिलकर बना है।
जिसमे मस्सा और धनकोल गाँव में लोगों की संख्या अधिक है। मस्सा गाँव सभी गाँव का सेण्टर है। क्योंकि कोई भी सामाजिक फैसला यही से किया जाता है। साथ में इस गाँव में पढ़े-लिखे और बुद्धिजीवी वर्ग अधिक है। मस्सा के अन्दर राजनीतिक विचार वाले तीन दिग्गज है। संजय कुमार, अरुण ठाकुर और मो० साहुब साहब। धनकोल में सिर्फ एक जयकिशोर। वैसे ये सारे व्यक्ति मेरे पिता जी श्री जयनंदन कुमार के समय में एक कार्यकर्त्ता के रूप में काम करते थे। मेरे पिता जी पंचायत का संचालन अरुण ठाकुर के जिम्मे पर छोड़ दिया। जिस कारण समाज के लोगों में नाराजिगी उत्पन्न हो गया। इसके वजह से २००० में मेरे पिता जी का हार हुआ। लेकिन इसको हमलोग हार नहीं कहेंगे क्योंकि उस समय जयकिशोर के पिताजी भरत यादव बूथ छापमरी कर के वोट का बढ़त बना लिया और जीत गया। उसने पांच साल पुरे दबंग तरीकों शासन किया। साथ समाज में काफी लज्जित करने वाले काम करने लगा। इसका फायदा लेने के लिए अरुण ठाकुर के साथ-साथ कितने आदमी जुड़ गया। जिस कारण समाज में विकास की गति रुक गया। इस सब के विरुद्ध युवा वर्ग आगे आया जिसका संचालन मेरे भाई संजय कुमार ने किया। इन लोगों को समाज भी साथ देना शुरू कर दिया। २००६ में समाज ने मेरे माता श्रीमती यशोदा देवी को एक तरफ़ा वोट से जीत दिला दिया। समाज का सारा भार युवा वर्ग अपने हाथों में ले लिया। और पुरे मस्ती के साथ पांच साल समाज के अन्दर विकास किया। साथ में, राजनीती को मूल मन्त्रों को सिखा। संजय कुमार ने सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में सिर्फ युवा वर्ग को ही रखा। जिस कारण दूसरी तरफ एक पुराने राजनीती करने वाले लोग, जो मेरे पिताजी के समय के थे। वे लोग हमेशा इनके विरुद्ध में रहने लगे। लेकिन संजय कुमार को इससे कोई समस्या नहीं था। लेकिन उनको कभी-कभी डर होता था। डर इस बात के लिए होता था की मुखिया पद पर उनकी माँ थी। पिता जी भी युवा को आगे बढ़ने के लिए एक मोका दे दिया। वे जानते थे की राजनीती सिखने के लिए इस सबको पांच साल लगेगा। साथ-ही इनलोगों पर नजर भी रखते थे। समाज के कुछ लोग इनको कहते भी थे। समाज का संचालन आप खुद करें। क्योंकि वोट आपको दिए आपके बेटे को नहीं।
जिसमे मस्सा और धनकोल गाँव में लोगों की संख्या अधिक है। मस्सा गाँव सभी गाँव का सेण्टर है। क्योंकि कोई भी सामाजिक फैसला यही से किया जाता है। साथ में इस गाँव में पढ़े-लिखे और बुद्धिजीवी वर्ग अधिक है। मस्सा के अन्दर राजनीतिक विचार वाले तीन दिग्गज है। संजय कुमार, अरुण ठाकुर और मो० साहुब साहब। धनकोल में सिर्फ एक जयकिशोर। वैसे ये सारे व्यक्ति मेरे पिता जी श्री जयनंदन कुमार के समय में एक कार्यकर्त्ता के रूप में काम करते थे। मेरे पिता जी पंचायत का संचालन अरुण ठाकुर के जिम्मे पर छोड़ दिया। जिस कारण समाज के लोगों में नाराजिगी उत्पन्न हो गया। इसके वजह से २००० में मेरे पिता जी का हार हुआ। लेकिन इसको हमलोग हार नहीं कहेंगे क्योंकि उस समय जयकिशोर के पिताजी भरत यादव बूथ छापमरी कर के वोट का बढ़त बना लिया और जीत गया। उसने पांच साल पुरे दबंग तरीकों शासन किया। साथ समाज में काफी लज्जित करने वाले काम करने लगा। इसका फायदा लेने के लिए अरुण ठाकुर के साथ-साथ कितने आदमी जुड़ गया। जिस कारण समाज में विकास की गति रुक गया। इस सब के विरुद्ध युवा वर्ग आगे आया जिसका संचालन मेरे भाई संजय कुमार ने किया। इन लोगों को समाज भी साथ देना शुरू कर दिया। २००६ में समाज ने मेरे माता श्रीमती यशोदा देवी को एक तरफ़ा वोट से जीत दिला दिया। समाज का सारा भार युवा वर्ग अपने हाथों में ले लिया। और पुरे मस्ती के साथ पांच साल समाज के अन्दर विकास किया। साथ में, राजनीती को मूल मन्त्रों को सिखा। संजय कुमार ने सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में सिर्फ युवा वर्ग को ही रखा। जिस कारण दूसरी तरफ एक पुराने राजनीती करने वाले लोग, जो मेरे पिताजी के समय के थे। वे लोग हमेशा इनके विरुद्ध में रहने लगे। लेकिन संजय कुमार को इससे कोई समस्या नहीं था। लेकिन उनको कभी-कभी डर होता था। डर इस बात के लिए होता था की मुखिया पद पर उनकी माँ थी। पिता जी भी युवा को आगे बढ़ने के लिए एक मोका दे दिया। वे जानते थे की राजनीती सिखने के लिए इस सबको पांच साल लगेगा। साथ-ही इनलोगों पर नजर भी रखते थे। समाज के कुछ लोग इनको कहते भी थे। समाज का संचालन आप खुद करें। क्योंकि वोट आपको दिए आपके बेटे को नहीं। मस्सा ग्राम पंचायत में मुखिया पद के लिए तेरह उम्मीदवार थे। लेकिन चुनावी लडाई चार उम्मीदवार सबसे आगे था- संजय कुमार, जयकिशोर, मो० साहूब और अरुण ठाकुर। संजय कुमार और जयकिशोर यादव एक ही उम्र और युवा सोंच रखने वाला व्यक्ति था। दूसरी तरफ मो० साहूब साहब आरजेडी समर्थक और अरुण ठाकुर वीजेपी समर्थक लेकिन अध्यक्ष कांग्रेस के थे। इन दोनों के पास आज भी पुराने विचारधारा और जाति-पाती को राजनीती करना, लेकिन समाज के अधिकतर युवा इन लोगों को महत्व नहीं देता है।
चुनाव 20 अप्रैल को था- लेकिन 18 से चुनावी लड़ाई काफी तेज हो चूका था।
सभी उम्मीदवार अपने वोट के लिए तरह-तरह के मुद्दे बनाकर समाज के लोगों को समझा रहा था। आपलोग मुझको एक मोका दीजिये, में भी आप के लिए कुछ करना चाहता हूँ। संजय कुमार को हर से कोई भय नहीं था। उनका एक ही इच्छा था की उनलोगों सबक सिखाना जो राजनीती और पद को एक कमाने और खाने का जरिया समझते है। और यह भी जनता था की ये लोग जीतने के लिए कल, बल, छल और पैसा चारों का इस्तेमाल करेगा। समाज के लोग भी पैसा के लोभ में आकर वोट को इधर से उधर कर सकता था। क्योंकि बिहार सरकार के द्वारा के अन्दर काफी विकास हो जाने के कारण समाज के लोगों में लालच पैदा हो गया था। और अधिकांश लोग इसका फायदा लेना चाहते था।
सभी उम्मीदवार अपने वोट के लिए तरह-तरह के मुद्दे बनाकर समाज के लोगों को समझा रहा था। आपलोग मुझको एक मोका दीजिये, में भी आप के लिए कुछ करना चाहता हूँ। संजय कुमार को हर से कोई भय नहीं था। उनका एक ही इच्छा था की उनलोगों सबक सिखाना जो राजनीती और पद को एक कमाने और खाने का जरिया समझते है। और यह भी जनता था की ये लोग जीतने के लिए कल, बल, छल और पैसा चारों का इस्तेमाल करेगा। समाज के लोग भी पैसा के लोभ में आकर वोट को इधर से उधर कर सकता था। क्योंकि बिहार सरकार के द्वारा के अन्दर काफी विकास हो जाने के कारण समाज के लोगों में लालच पैदा हो गया था। और अधिकांश लोग इसका फायदा लेना चाहते था।वोट डालने से एक दिन पहले- 19 अप्रैल 2011 चुनाव के अंतिम दिन, क़ानूनी रूप से चुनावी प्रचार-प्रसार शाम ५ बजे बंद हो जाता है।
मै अपनी गाड़ी से कुछ सहयोगी दोस्तों के साथ पुरे पंचायत के जायजा लेने के लिए निकल पड़ा। समाज के लोग मुझे एक विधायक रूप मे देखकर काफी स्वागत करता था। मैंने उनलोगों कहा- मै एक विधायक के प्रत्याशी होने के वजह से, मै अपने माता श्रीमती यशोदा देवी के लिए वोट भी नहीं मांग सकता क्योंकि हामारे लिए उम्मीदवार और जनता बराबर है। लेकिन इतना जरुर बोल सकता हूँ की "राजनीती में कोई जाति नहीं होता है, सीरत वोट होता है।" इसलिए आपलोग जाति-पाती से दूर हटकर अपना वोट सोंच समझकर डाले। अधिक उम्मीदवार मुझे देखकर नजर झुका लेता था। लेकिन मै उनसे पूछता था की सब ठीक है। आप मुझसे आँखें मत चुराए। मेरी माता उम्मीदवार है तो क्या हुआ। हमलोगन स्वतंत्र है। हर कोई वोट मांग सकता है। लेकिन जनता को विवश करके और हिंसा के रूप में नहीं। मै चाहता हूँ की चुनाव शांतिमय रूप से हो। इसलिए आपलोगों से मिलने की लिए आया हूँ। हर-जीत का फैसला जनता के हाथों में है।
मै अपनी गाड़ी से कुछ सहयोगी दोस्तों के साथ पुरे पंचायत के जायजा लेने के लिए निकल पड़ा। समाज के लोग मुझे एक विधायक रूप मे देखकर काफी स्वागत करता था। मैंने उनलोगों कहा- मै एक विधायक के प्रत्याशी होने के वजह से, मै अपने माता श्रीमती यशोदा देवी के लिए वोट भी नहीं मांग सकता क्योंकि हामारे लिए उम्मीदवार और जनता बराबर है। लेकिन इतना जरुर बोल सकता हूँ की "राजनीती में कोई जाति नहीं होता है, सीरत वोट होता है।" इसलिए आपलोग जाति-पाती से दूर हटकर अपना वोट सोंच समझकर डाले। अधिक उम्मीदवार मुझे देखकर नजर झुका लेता था। लेकिन मै उनसे पूछता था की सब ठीक है। आप मुझसे आँखें मत चुराए। मेरी माता उम्मीदवार है तो क्या हुआ। हमलोगन स्वतंत्र है। हर कोई वोट मांग सकता है। लेकिन जनता को विवश करके और हिंसा के रूप में नहीं। मै चाहता हूँ की चुनाव शांतिमय रूप से हो। इसलिए आपलोगों से मिलने की लिए आया हूँ। हर-जीत का फैसला जनता के हाथों में है। अब राजनीती नहीं, कूटनीति का समय है- उम्मीदवार के लिए अंतिम रात काफी महत्वपूर्ण होता है। शायद जनता इसी रात को उम्मीदवार को वोट डालने निर्णय लेता है।
उम्मीदवार भी अपना सारा शक्ति लगा देता है। उम्मीदवार रात-भर अपने-अपने वोटर को काबू करने लगता है। शाम के ६ बज रहा था। कुछ घंटो में पता चला की समाज के एक व्यक्ति ने समाज के अन्दर हवा उड़ा दिया की संजय कुमार वोट के लिए समाज के हर व्यक्ति को ५०० रुपया बाँट रहा है। यह बात सही नहीं था। शायद, राजनीती और कूटनीति में काम करता है। जिसको हमलोग 'हवा' फैलाना कहते है। यह बात सुनकर सारे उम्मीदवार पसीना छूटने लगा। संजय कुमार कहाँ है। किसी को नहीं पता। संजय कुमार अपना सारा नीति मोबाइल और अपने समर्थक के द्वारा कर रहा था। इस हवा से जनता को काफी फायदा हुआ। क्योंकि उनको खाने-पीने का जुगार मिल गया था। कुछ समय के बाद देखता हूँ की हर उम्मीदवार अपने-अपने समर्थक के साथ कम से कम १५-२० मोटर साइकिल लेकर पुरे पंचायत के अन्दर चक्कर काट रहा है। कभी इस चोक पर तो कभी उस चोक पर। कोई बोल रहा था। उस गाँव में पैसे बाँट रहे है। मुझे सबसे आश्चर्य की बात यह देखने को मिला की संजय कुमार का समर्थक हर उम्मीदवार के साथ और हर पल की खबर इनको मिल जाता था। उधर मो साहुब साहब मुस्लिम को एक करने में जूता हुआ है। जो बाद सारा मुस्लमान एक हो गया। इधर अरुण ठाकुर ब्राहमण को एक करने में जुटता हुआ था। जो बात में ब्राहमण भी एक हो गया। संजय कुमार यही दृश्य समाज को दिखाना चाहता था। क्योंकि ये लोग चुनाव से पहले जाति का मुद्दा बना कर लोगों भरकता था। वे लोग अच्छी तरह से जानता भी था। सरकार के तरफ से ही अनुमति है की गरीबी रेखा से नीचे रहने वालों के ऊपर अधिक ध्यान देना है। संजय कुमार जाति के कुशवाहा है। जो की उन्होंने अपने कुशवाहा जाति के लिए कुछ नहीं किया। उन्होंने गरीब लोगों के लिए किया, जिसमे सारे जाति समलित थे। इसमे उस जाति संख्या अधिक था। जिसको भारत के लोगों कहना है की ये लोग नीच जाति के लोग है। जैसे- चमार, दुसाद, मुसहर, दस, कबाड़ी, बढए और यादव। सामाजिक रूप से सड़क, बिजली, स्कूल इत्यादी। जिसका फायदा सिर्फ नीच वर्ग के लोग ही नहीं करते, इसका फायदा उच्च वर्ग के लोग भी करते है।
उम्मीदवार भी अपना सारा शक्ति लगा देता है। उम्मीदवार रात-भर अपने-अपने वोटर को काबू करने लगता है। शाम के ६ बज रहा था। कुछ घंटो में पता चला की समाज के एक व्यक्ति ने समाज के अन्दर हवा उड़ा दिया की संजय कुमार वोट के लिए समाज के हर व्यक्ति को ५०० रुपया बाँट रहा है। यह बात सही नहीं था। शायद, राजनीती और कूटनीति में काम करता है। जिसको हमलोग 'हवा' फैलाना कहते है। यह बात सुनकर सारे उम्मीदवार पसीना छूटने लगा। संजय कुमार कहाँ है। किसी को नहीं पता। संजय कुमार अपना सारा नीति मोबाइल और अपने समर्थक के द्वारा कर रहा था। इस हवा से जनता को काफी फायदा हुआ। क्योंकि उनको खाने-पीने का जुगार मिल गया था। कुछ समय के बाद देखता हूँ की हर उम्मीदवार अपने-अपने समर्थक के साथ कम से कम १५-२० मोटर साइकिल लेकर पुरे पंचायत के अन्दर चक्कर काट रहा है। कभी इस चोक पर तो कभी उस चोक पर। कोई बोल रहा था। उस गाँव में पैसे बाँट रहे है। मुझे सबसे आश्चर्य की बात यह देखने को मिला की संजय कुमार का समर्थक हर उम्मीदवार के साथ और हर पल की खबर इनको मिल जाता था। उधर मो साहुब साहब मुस्लिम को एक करने में जूता हुआ है। जो बाद सारा मुस्लमान एक हो गया। इधर अरुण ठाकुर ब्राहमण को एक करने में जुटता हुआ था। जो बात में ब्राहमण भी एक हो गया। संजय कुमार यही दृश्य समाज को दिखाना चाहता था। क्योंकि ये लोग चुनाव से पहले जाति का मुद्दा बना कर लोगों भरकता था। वे लोग अच्छी तरह से जानता भी था। सरकार के तरफ से ही अनुमति है की गरीबी रेखा से नीचे रहने वालों के ऊपर अधिक ध्यान देना है। संजय कुमार जाति के कुशवाहा है। जो की उन्होंने अपने कुशवाहा जाति के लिए कुछ नहीं किया। उन्होंने गरीब लोगों के लिए किया, जिसमे सारे जाति समलित थे। इसमे उस जाति संख्या अधिक था। जिसको भारत के लोगों कहना है की ये लोग नीच जाति के लोग है। जैसे- चमार, दुसाद, मुसहर, दस, कबाड़ी, बढए और यादव। सामाजिक रूप से सड़क, बिजली, स्कूल इत्यादी। जिसका फायदा सिर्फ नीच वर्ग के लोग ही नहीं करते, इसका फायदा उच्च वर्ग के लोग भी करते है।रात के १० बज रहा था- मै अपने कुछ दोस्तों के साथ एक दोस्त के दरवाजे पर रखा कुर्सी बैठा हुआ था। सड़क से होकर उम्मीदवार के समर्थक मोटर साइकिल से इधर-उधर दोर लगा रहा था। शान्तिभारी रातों मे मोटर साइकिल की आवाज भट-भट और उसकी रौशनी सडको पर नजर आ रहा था। हमारा साथी कभी-कभी डर कर अन्दर भाग जाता था की कही पुलिस की गाड़ी न हो। ये नोटंकी रात-भर चलता रहा। जनता भी इसका खूब फायदा उठाया, खूब खाया और पीया भी। समाज के कुछ लोग उम्मीदवार को से कह रहा है हमारे पास १०० वोट है। पैसा दीजियेगा तो सारा वोट आपको दिलवा दूंगा। ये लोग सिर्फ उम्मीदवार को मुर्ख बना रहा था क्योंकि हर उम्मीदवार से यह बात कह कर पैसा निकल लेता था।
चुनाव के दिन- २० अप्रैल २०११, चुनाव का दिन। इस दिन के लिए सभी लोग इंतजार कर रहा था।
६ बजे सुबह से चहल-कदमी शुरू हो गया। हर उम्मीदवार का अपना-अपना आदमी बूथ से १०० मीटर के दुरी पर बैठ गया। प्रशासन भी पूरी तरह अपने-अपने जगह पर तैनात हो गया। सुबह ७ बजे वोट डालना शुरू हो गया। समाज के सभी महिला और पुरुष बाड़ी-बाड़ी से वोट डालने के लिए आ रहे थे और जा रहे थे। पुरे पंचायत के अंदर लगभग १४ बूथ थे। रास्ते में लोगों चहल-कदमी देखकर एसा लग रहा था की हमरे गाँव में कोई त्यौहार हो रहा था। और समाज के सभी लोग अपने-अपने काम में व्यस्त है। अपने समाज के लिए एक सामाजिक दायित्व निभा रहे। लगभग १ बजे मैंने भी अपने वोट डालने बूथ पर पहुंचा लेकिन बूथ पर बहुत बड़ी लाइन लगा हुआ था। जिस कारण मुझे १ गनते तक लाइन खड़ा रहना पड़ा। लेकिन एक घंटे में मुझे बहुत कुछ देखने को मिला। अशिक्षित लोगों वोट डालने काफी मुश्किल का सामना कर रहा था। बहुत से लोग सिर्फ एक वेलेट पेपर पर मोहर मरकर लोट आया। बाकि का उनको समझ नहीं था। ६ बजे के लगभग वोट डालना बंद हो गया। उम्मीदवार के आलावा समाज के सभी लोग एक बहुत बड़ा दायित्व समापन के बाद राहत की साँस लिया।
६ बजे सुबह से चहल-कदमी शुरू हो गया। हर उम्मीदवार का अपना-अपना आदमी बूथ से १०० मीटर के दुरी पर बैठ गया। प्रशासन भी पूरी तरह अपने-अपने जगह पर तैनात हो गया। सुबह ७ बजे वोट डालना शुरू हो गया। समाज के सभी महिला और पुरुष बाड़ी-बाड़ी से वोट डालने के लिए आ रहे थे और जा रहे थे। पुरे पंचायत के अंदर लगभग १४ बूथ थे। रास्ते में लोगों चहल-कदमी देखकर एसा लग रहा था की हमरे गाँव में कोई त्यौहार हो रहा था। और समाज के सभी लोग अपने-अपने काम में व्यस्त है। अपने समाज के लिए एक सामाजिक दायित्व निभा रहे। लगभग १ बजे मैंने भी अपने वोट डालने बूथ पर पहुंचा लेकिन बूथ पर बहुत बड़ी लाइन लगा हुआ था। जिस कारण मुझे १ गनते तक लाइन खड़ा रहना पड़ा। लेकिन एक घंटे में मुझे बहुत कुछ देखने को मिला। अशिक्षित लोगों वोट डालने काफी मुश्किल का सामना कर रहा था। बहुत से लोग सिर्फ एक वेलेट पेपर पर मोहर मरकर लोट आया। बाकि का उनको समझ नहीं था। ६ बजे के लगभग वोट डालना बंद हो गया। उम्मीदवार के आलावा समाज के सभी लोग एक बहुत बड़ा दायित्व समापन के बाद राहत की साँस लिया। समाज के सभी चोक-चोराहे पर- सुबह के चाय के साथ वोट का चर्चा हो रहा था।
तभी संजय कुमार चाय के दुकान पर पहुंचा और वहां बैठे सभी लोगों को बोल दिया की मेरी माँ श्रीमती यशोदा देवी हार गयी।लेकिंग लोगों को विश्वास नहीं हुआ। क्योंकि वोट का परिणाम एक महीने में निकलने वाला था। लेकिन यह एक महिना उम्मीदवारों के लिए काफी चिंता जनक था। क्योंकि जो उम्मीदवार जीत रहा है उसका भी बुरा हालत हो रहा था। कही से कुछ तो कही से कुछ खबर मिल रहा था। महीने भर चारों तरफ सिर्फ जीत-हार का चर्चा हो रहा था। संजय कुमार और कुछ जनता के समीकरण के अनुसार जयकिशोर की माँ की जीत होगी। मस्सा गाँव का वोट बंट चूका था। और दूसरी तरफ धनकोल के जनता एकजुट होकर जयकिशोर के माँ को वोट दे दिया। क्योंकि उनलोगों यह मालूम था मस्सा गाँव जातीयता आ चूका है।
तभी संजय कुमार चाय के दुकान पर पहुंचा और वहां बैठे सभी लोगों को बोल दिया की मेरी माँ श्रीमती यशोदा देवी हार गयी।लेकिंग लोगों को विश्वास नहीं हुआ। क्योंकि वोट का परिणाम एक महीने में निकलने वाला था। लेकिन यह एक महिना उम्मीदवारों के लिए काफी चिंता जनक था। क्योंकि जो उम्मीदवार जीत रहा है उसका भी बुरा हालत हो रहा था। कही से कुछ तो कही से कुछ खबर मिल रहा था। महीने भर चारों तरफ सिर्फ जीत-हार का चर्चा हो रहा था। संजय कुमार और कुछ जनता के समीकरण के अनुसार जयकिशोर की माँ की जीत होगी। मस्सा गाँव का वोट बंट चूका था। और दूसरी तरफ धनकोल के जनता एकजुट होकर जयकिशोर के माँ को वोट दे दिया। क्योंकि उनलोगों यह मालूम था मस्सा गाँव जातीयता आ चूका है। चुनाव परिणाम आने के बाद मस्सा गाँव में सन्नाटा सा छा गया। के लोगों का नजर नीचे झुक गया क्योंकि किसी को उम्मीद नहीं नहीं था की धनकोल के उम्मीदवार जीत जायेगा। मस्सा गाँव, पंचायत का सेंटर है और यहाँ शिक्षित लोगों की जनसँख्या काफी है। दूसरी तरफ धनकोल में शिक्षित बहुत कम है। मस्सा गाँव के लोगों ने अपनी गलती को महसूस किया की हमलोग जाति-पाती के चक्कर में फंसकर अपनी कुल्हारी अपने पैर पर खुद मारा। समाज के बहुत लोगों ने संजय कुमार से माफ़ी माँगा की मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गया। हमलोग लालच में आकर अपने वोट को महत्पूर्ण नहीं दिया। ये हमारी समाज की हार है, आपकी नहीं। समाज की यह वेदना और उसकी दिल की आवाज संजय कुमार को जीत दिलवा दिया। इससे मै बहुत खुश हूँ की समाज के लोगों ने अपनी गलती को दिल से महसूस किया जिससे आने वाले कल चुनाव में शायद जाति शब्द का महत्व समाप्त हो जाये। इसलिए राजनीती का मतलब सिर्फ सत्ता प्राप्ति भर नहीं रखना चाहिए, इसमे जनता की एकता और ताक़त जरुरी है।